The Essence of the Tantra· 20.52 / 65

The Essence of the Tantra20.52

20.52

सर्वशास्त्रसम्पूर्णं गुरुं व्याख्यार्थम् अभ्यर्थयेत सो ऽपि स्वशिष्याय परशिष्यायापि वा समुचितसंस्कारोचितं शास्त्रं व्याचक्षीत अधरशासनस्थायापि करुणावशात् ईश्वरेच्छावैचित्र्योद्भावितशक्तिपातसम्भावनाभावितहृदयो व्याचक्षीत मर्मोपदेशवर्जम्

Transliteration (IAST)

sarvaśāstrasampūrṇaṃ guruṃ vyākhyārtham abhyarthayeta so 'pi svaśiṣyāya paraśiṣyāyāpi vā samucitasaṃskārocitaṃ śāstraṃ vyācakṣīta adharaśāsanasthāyāpi karuṇāvaśāt īśvarecchāvaicitryodbhāvitaśaktipātasambhāvanābhāvitahṛdayo vyācakṣīta marmopadeśavarjam

— सर्व शास्त्रों में सम्पूर्ण (निष्णात) ; — गुरु से ; — व्याख्या के लिए प्रार्थना करे ; — अपने शिष्य के लिए अथवा अन्य के शिष्य के लिए भी ; — उचित संस्कार के अनुरूप ; — व्याख्या करे ; — निम्न शासन में स्थित (शिष्य) के लिए भी ; — करुणावश ; — ईश्वर की इच्छा की विचित्रता से उद्भावित शक्तिपात की सम्भावना से भावित हृदय वाला ; — मर्म-उपदेश को छोड़कर

सर्व शास्त्रों में सम्पूर्ण (निष्णात) गुरु से व्याख्या के लिए प्रार्थना करे; वह भी अपने शिष्य के लिए अथवा अन्य के शिष्य के लिए भी, उचित संस्कार के अनुरूप शास्त्र की व्याख्या करे। निम्न शासन में स्थित (शिष्य) के लिए भी, करुणावश, ईश्वर की इच्छा की विचित्रता से उद्भावित शक्तिपात की सम्भावना से भावित हृदय वाला (गुरु) व्याख्या करे — मर्म-उपदेश को छोड़कर।