The Essence of the Tantra· 20.14 / 65

The Essence of the Tantra20.14

20.14

कृत्वाधारधरां चमत्कृतिरसप्रोक्षाक्षणक्षालिताम् आत्तैर् मानसतः स्वभावकुसुमैः स्वामोदसन्दोहिभिः

Transliteration (IAST)

kṛtvādhāradharāṃ camatkṛtirasaprokṣākṣaṇakṣālitām āttair mānasataḥ svabhāvakusumaiḥ svāmodasandohibhiḥ

— (चैतन्य को) आधार-धरा (आधारभूत भूमि) बनाकर ; — चमत्कृति-रस की प्रोक्षा (छिड़काव) से क्षण भर में क्षालित ; — गृहीत — लिये गये (पुष्पों से) ; — मानसिक रूप से, मन से ; — स्व-भाव-कुसुमों से (निज स्वभाव के पुष्पों से) ; — जो अपनी आमोद (सुगन्ध) बिखेरते हैं

(चैतन्य को) आधार-धरा बनाकर, चमत्कृति-रस की प्रोक्षा (छिड़काव) से क्षण भर में क्षालित (शुद्ध), मानसिक रूप से गृहीत, अपनी आमोद (सुगन्ध) को बिखेरते स्व-भाव-कुसुमों से —