कृत्वाधारधरां चमत्कृतिरसप्रोक्षाक्षणक्षालिताम् आत्तैर् मानसतः स्वभावकुसुमैः स्वामोदसन्दोहिभिः
Transliteration (IAST)
kṛtvādhāradharāṃ camatkṛtirasaprokṣākṣaṇakṣālitām āttair mānasataḥ svabhāvakusumaiḥ svāmodasandohibhiḥ
(चैतन्य को) आधार-धरा बनाकर, चमत्कृति-रस की प्रोक्षा (छिड़काव) से क्षण भर में क्षालित (शुद्ध), मानसिक रूप से गृहीत, अपनी आमोद (सुगन्ध) को बिखेरते स्व-भाव-कुसुमों से —