The Essence of the Tantra· 20.15 / 65

The Essence of the Tantra20.15

20.15

आनन्दामृतनिर्भरस्वहृदयानर्घार्घपात्रक्रमात् त्वां देव्या सह देहदेवसदने देवार्चये ऽहर्निशम्

Transliteration (IAST)

ānandāmṛtanirbharasvahṛdayānarghārghapātrakramāt tvāṃ devyā saha dehadevasadane devārcaye 'harniśam

— आनन्द-अमृत से निर्भर अपने हृदय रूप अनर्घ (अमूल्य) अर्घ-पात्र के क्रम से ; — तुझे ; — देवी के साथ ; — देह रूप देव-सदन (मन्दिर) में ; — हे देव, मैं अहर्निश (दिन-रात) अर्चित करता हूँ

आनन्द-अमृत से निर्भर अपने हृदय रूप अनर्घ (अमूल्य) अर्घ-पात्र के क्रम से, हे देव, मैं तुझे देवी के साथ देह रूप देव-सदन (मन्दिर) में अहर्निश (दिन-रात) अर्चित करता हूँ।