The Essence of the Tantra· 20.1 / 65

The Essence of the Tantra20.1

20.1

तत्र या दीक्षा संस्कारसिद्ध्यै ज्ञानयोग्यान् प्रति या च तदशक्तान् प्रति मोक्षदीक्षा सबीजा तस्यां कृतायाम् आजीवं शेषवर्तनं गुरुः उपदिशेत्

Transliteration (IAST)

tatra yā dīkṣā saṃskārasiddhyai jñānayogyān prati yā ca tadaśaktān prati mokṣadīkṣā sabījā tasyāṃ kṛtāyām ājīvaṃ śeṣavartanaṃ guruḥ upadiśet

— जो दीक्षा संस्कार-सिद्धि के लिए ; — ज्ञान-योग्यों के प्रति ; — उसमें अशक्तों के प्रति ; — सबीज मोक्ष-दीक्षा (देह-जीवन का बीज रखने वाली) ; — उसके किये जाने पर ; — आजीवन — जीवन-पर्यन्त ; — शेष-वर्तन (दीक्षोत्तर आचरण) ; — गुरु उपदेश करे

वहाँ जो दीक्षा संस्कार-सिद्धि के लिए ज्ञान-योग्यों के प्रति (होती है), तथा जो उसमें अशक्तों के प्रति सबीज मोक्ष-दीक्षा (होती है) — उसके किये जाने पर गुरु आजीवन (जीवन-पर्यन्त) शेष-वर्तन का उपदेश करे।