The Essence of the Tantra· 19.7 / 7

The Essence of the Tantra19.7

19.7

सर्वत्र च अत्र श्राद्धादिविधौ मूर्तियागः प्रधानम् इति श्रीसिद्धामतम् तद्विधिश् च वक्ष्यते नैमित्तिकप्रकाशने

Transliteration (IAST)

sarvatra ca atra śrāddhādividhau mūrtiyāgaḥ pradhānam iti śrīsiddhāmatam tadvidhiś ca vakṣyate naimittikaprakāśane

— यहाँ सर्वत्र ; — श्राद्ध आदि विधि में ; — मूर्ति-याग (मूर्ति-रूप पूजन) ; — प्रधान — प्रमुख ; — श्रीसिद्धा-मत (सिद्धा-तन्त्र का सिद्धान्त) ; — उसकी विधि ; — कही जायेगी ; — नैमित्तिक-प्रकाशन में

और यहाँ सर्वत्र श्राद्ध आदि विधि में मूर्ति-याग प्रधान है — ऐसा श्रीसिद्धा-मत है; और उसकी विधि नैमित्तिक-प्रकाशन में कही जायेगी।