The Essence of the Tantra· 20.2 / 65

The Essence of the Tantra20.2

20.2

तत्र नित्यं नैमित्तिकं काम्यम् इति त्रिविधं शेषवर्तनम् अन्त्यं च साधकस्यैव तत् न इह निश्चेतव्यम्

Transliteration (IAST)

tatra nityaṃ naimittikaṃ kāmyam iti trividhaṃ śeṣavartanam antyaṃ ca sādhakasyaiva tat na iha niścetavyam

— नित्य — दैनिक कर्म ; — नैमित्तिक — अवसर-कर्म ; — काम्य — कामना-प्रेरित कर्म ; — त्रिविध शेष-वर्तन ; — अन्तिम (काम्य) ; — साधक का ही ; — यहाँ निश्चेतव्य (निर्धारित) नहीं

वहाँ नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य — इस प्रकार त्रिविध शेष-वर्तन है; और अन्तिम (काम्य) साधक का ही है, अतः वह यहाँ निश्चेतव्य (निर्धारित किया जाने योग्य) नहीं है।