बहिर् अपि इत्थं कथं न भवति आकर्षणादौ विनाभ्यासात् इति चेत् रागद्वेषादियोगवशेन तत्प्रवृत्तौ ऐश्वर्यावेशायोगात्
Transliteration (IAST)
bahir api itthaṃ kathaṃ na bhavati ākarṣaṇādau vinābhyāsāt iti cet rāgadveṣādiyogavaśena tatpravṛttau aiśvaryāveśāyogāt
(शंका) बाहर भी इस प्रकार आकर्षण आदि में अभ्यास के बिना क्यों नहीं होता? यदि ऐसा पूछो, तो (उत्तर) राग-द्वेष आदि के योग के वश से उसमें प्रवृत्ति होने पर ऐश्वर्य-आवेश का अयोग (अभाव) होने के कारण।