The Essence of the Tantra· 16.10 / 24

The Essence of the Tantra16.10

16.10

बहिर् अपि इत्थं कथं न भवति आकर्षणादौ विनाभ्यासात् इति चेत् रागद्वेषादियोगवशेन तत्प्रवृत्तौ ऐश्वर्यावेशायोगात्

Transliteration (IAST)

bahir api itthaṃ kathaṃ na bhavati ākarṣaṇādau vinābhyāsāt iti cet rāgadveṣādiyogavaśena tatpravṛttau aiśvaryāveśāyogāt

— बाहर भी (लौकिक प्रयोग में) ; — इस प्रकार (वर्णितानुसार) ; — क्यों नहीं होता ; — आकर्षण (व्यक्तियों के) आदि में ; — अभ्यास के बिना ; — राग-द्वेष आदि के योग के वश से ; — उसमें प्रवृत्ति होने पर ; — ऐश्वर्य-आवेश का अयोग (अभाव) के कारण

(शंका) बाहर भी इस प्रकार आकर्षण आदि में अभ्यास के बिना क्यों नहीं होता? यदि ऐसा पूछो, तो (उत्तर) राग-द्वेष आदि के योग के वश से उसमें प्रवृत्ति होने पर ऐश्वर्य-आवेश का अयोग (अभाव) होने के कारण।