The Essence of the Tantra· 13.79 / 101

The Essence of the Tantra13.79

13.79

गुरौ सर्वात्मना भक्तिः तथा शास्त्रे देवे तत्प्रतिद्वन्द्विनि पराङ्मुखता गुरुवत् गुरुपुत्रादेः विद्यासम्बन्धकृतस्य तत्पूर्वदीक्षितादेः सन्दर्शनम् यौनसम्बन्धस्य तदाराधनार्थम् न तु स्वत इति मन्तव्यम्

Transliteration (IAST)

gurau sarvātmanā bhaktiḥ tathā śāstre deve tatpratidvandvini parāṅmukhatā guruvat guruputrādeḥ vidyāsambandhakṛtasya tatpūrvadīkṣitādeḥ sandarśanam yaunasambandhasya tadārādhanārtham na tu svata iti mantavyam

— गुरु में सर्वात्मना भक्ति ; — देव में ; — उसके प्रतिद्वन्द्वी (विरोधी देव) के प्रति ; — पराङ्मुखता — विमुखता ; — गुरु-पुत्र आदि का ; — विद्या-सम्बन्ध-कृत का ; — उससे पहले दीक्षित आदि का ; — सन्दर्शन — आदर ; — यौन (विवाह) सम्बन्ध वाले का ; — उसकी (गुरु की) आराधना के लिए ; — किन्तु स्वतः नहीं

गुरु में सर्वात्मना भक्ति, वैसे ही शास्त्र एवं देव में; उसके प्रतिद्वन्द्वी (विरोधी देव) से पराङ्मुखता; गुरुवत् गुरु-पुत्र आदि का, विद्या-सम्बन्ध-कृत का, उससे पहले दीक्षित आदि का सन्दर्शन (आदर); यौन (विवाह) सम्बन्ध वाले का उसकी (गुरु की) आराधना के लिए (आदर), किन्तु स्वतः नहीं — ऐसा मन्तव्य है।