गुरौ सर्वात्मना भक्तिः तथा शास्त्रे देवे तत्प्रतिद्वन्द्विनि पराङ्मुखता गुरुवत् गुरुपुत्रादेः विद्यासम्बन्धकृतस्य तत्पूर्वदीक्षितादेः सन्दर्शनम् यौनसम्बन्धस्य तदाराधनार्थम् न तु स्वत इति मन्तव्यम्
Transliteration (IAST)
gurau sarvātmanā bhaktiḥ tathā śāstre deve tatpratidvandvini parāṅmukhatā guruvat guruputrādeḥ vidyāsambandhakṛtasya tatpūrvadīkṣitādeḥ sandarśanam yaunasambandhasya tadārādhanārtham na tu svata iti mantavyam
गुरु में सर्वात्मना भक्ति, वैसे ही शास्त्र एवं देव में; उसके प्रतिद्वन्द्वी (विरोधी देव) से पराङ्मुखता; गुरुवत् गुरु-पुत्र आदि का, विद्या-सम्बन्ध-कृत का, उससे पहले दीक्षित आदि का सन्दर्शन (आदर); यौन (विवाह) सम्बन्ध वाले का उसकी (गुरु की) आराधना के लिए (आदर), किन्तु स्वतः नहीं — ऐसा मन्तव्य है।