The Essence of the Tantra· 12.4 / 10

The Essence of the Tantra12.4

12.4

तद् इह स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारे स्वात्मनि विश्वत्रापि वा तदन्यरूपसंवलनाभिमानः अशुद्धिः सा च महाभैरवसमावेशेन व्यपोह्यते सो ऽपि कस्यचित् झटिति भवेत् कस्यापि उपायान्तरमुखप्रेक्षी

Transliteration (IAST)

tad iha svatantrānandacinmātrasāre svātmani viśvatrāpi vā tadanyarūpasaṃvalanābhimānaḥ aśuddhiḥ sā ca mahābhairavasamāveśena vyapohyate so 'pi kasyacit jhaṭiti bhavet kasyāpi upāyāntaramukhaprekṣī

— स्वतन्त्र-आनन्द-चिन्मात्र-सार (जिसका सार चित्, स्वातन्त्र्य एवं आनन्द है) ; — अपने आत्मा में ; — विश्व में भी ; — उससे अन्य रूप के संवलन का अभिमान ; — अशुद्धि ; — महाभैरव-समावेश से ; — व्यपोहित (दूर) की जाती है ; — शीघ्र, सहसा ; — अन्य उपाय के मुख की प्रतीक्षा करने वाला

अतः यहाँ स्वतन्त्र-आनन्द-चिन्मात्र-सार अपने आत्मा में, अथवा विश्व में भी, उससे अन्य रूप के संवलन का अभिमान अशुद्धि है; और वह महाभैरव-समावेश से व्यपोहित (दूर) की जाती है। वह (समावेश) भी किसी को शीघ्र हो जाये, किसी को अन्य उपाय के मुख की प्रतीक्षा करने वाला (हो)।