तद् इह स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारे स्वात्मनि विश्वत्रापि वा तदन्यरूपसंवलनाभिमानः अशुद्धिः सा च महाभैरवसमावेशेन व्यपोह्यते सो ऽपि कस्यचित् झटिति भवेत् कस्यापि उपायान्तरमुखप्रेक्षी
Transliteration (IAST)
tad iha svatantrānandacinmātrasāre svātmani viśvatrāpi vā tadanyarūpasaṃvalanābhimānaḥ aśuddhiḥ sā ca mahābhairavasamāveśena vyapohyate so 'pi kasyacit jhaṭiti bhavet kasyāpi upāyāntaramukhaprekṣī
अतः यहाँ स्वतन्त्र-आनन्द-चिन्मात्र-सार अपने आत्मा में, अथवा विश्व में भी, उससे अन्य रूप के संवलन का अभिमान अशुद्धि है; और वह महाभैरव-समावेश से व्यपोहित (दूर) की जाती है। वह (समावेश) भी किसी को शीघ्र हो जाये, किसी को अन्य उपाय के मुख की प्रतीक्षा करने वाला (हो)।