The Essence of the Tantra· 12.5 / 10

The Essence of the Tantra12.5

12.5

तत्रापि च एकद्वित्र्यादिभेदेन समस्तव्यस्ततया क्वचित् कस्यचित् कदाचित् च तथा आश्वासोपलब्धेः विचित्रो भेदः

Transliteration (IAST)

tatrāpi ca ekadvitryādibhedena samastavyastatayā kvacit kasyacit kadācit ca tathā āśvāsopalabdheḥ vicitro bhedaḥ

— एक-दो-तीन आदि भेद से ; — समस्त-व्यस्त रूप से (संयुक्त एवं पृथक्) ; — कहीं, किसी स्थान पर ; — किसी को ; — कभी ; — आश्वास (दृढ़ विश्वास) की उपलब्धि के कारण ; — विचित्र भेद — नानाविध भेद

और वहाँ भी एक-दो-तीन आदि भेद से, समस्त-व्यस्त रूप से, कहीं, किसी को, कभी — वैसी आश्वास (दृढ़ विश्वास) की उपलब्धि होने के कारण विचित्र भेद (है)।