The Essence of the Tantra· 10.3 / 18

The Essence of the Tantra10.3

10.3

तद् यथा पृथिव्यां निवृत्तिः निवर्तते यतस् तत्त्वसर्ग इति

Transliteration (IAST)

tad yathā pṛthivyāṃ nivṛttiḥ nivartate yatas tattvasarga iti

— पृथिवी (तत्त्व) में ; — निवृत्ति-कला ; — निवृत्त होती है, समाप्त होती है ; — क्योंकि (जिस बिन्दु पर) ; — तत्त्व-सर्ग (तत्त्वों की सृष्टि)

वह इस प्रकार: पृथिवी में निवृत्ति (कला है), क्योंकि वहीं तत्त्व-सर्ग निवृत्त (समाप्त) होता है।