Stanzas on the Divine Pulsation · 3.10

Stanzas on the Divine Pulsation 3.10

3.10
अतो विन्दुरतो नादो रूपमस्मादतो रसः । प्रवर्तन्तेऽचिरेणैव क्षोभकत्वेन देहिनः ॥१०॥
ato vindur ato nādo rūpam asmād ato rasaḥ | pravartante 'cireṇaiva kṣobhakatvena dehinaḥ ||
anuṣṭubh
— इसलिए, अतः (अव्यय) ; — विन्दु (बिन्दु) — प्रकाश-बिन्दु (कर्ता कारक) ; — इसलिए, अतः (अव्यय) ; — नाद — आन्तरिक ध्वनि (कर्ता कारक) ; — रूप — आकार, वर्ण (कर्ता कारक, नपुंसक) ; — इससे (नपुं.पञ्चमी एक. सर्वनाम) ; — इसलिए, अतः (अव्यय) ; — रस — सूक्ष्म स्वाद (कर्ता कारक) ; — प्रवृत्त होती हैं, उद्यत होती हैं (वर्त. तृ.पु.बहु., √प्र-वृत्) ; — शीघ्र ही, अचिर काल में (अव्यय) ; — क्षोभकता से — विक्षेपकारी रूप में (करण कारक) ; — देहधारी के लिए — पु.षष्ठी एक.

इसी (उन्मेष) से बिन्दु (प्रकाश-बिन्दु), नाद (अन्तर-ध्वनि), रूप (दिव्य रूप) और रस (सूक्ष्म स्वाद) — देहधारी के लिए शीघ्र ही क्षोभकारी (चित्त-विक्षेपक) रूप में प्रवृत्त होते हैं।