Stanzas on the Divine Pulsation · 3.11

Stanzas on the Divine Pulsation 3.11

3.11
दिदृक्षयेव सर्वार्थान्यदा व्याप्यावतिष्ठते । तदा किं बहुनोक्तेन स्वयमेवावभोत्स्यते ॥११॥
didṛkṣayeva sarvārthān yadā vyāpyāvatiṣṭhate | tadā kiṃ bahunoktena svayam evāvabhotsyate ||
anuṣṭubh
— दिदृक्षा से — देखने की इच्छा से (करण कारक, स्त्रीलिङ्ग) ; — मानो, जैसे (तुलनार्थक अव्यय) ; — सब अर्थों (विषयों) को व्याप्त करके (पदबन्ध, पूर्वकालिक क्रिया) ; — जब (कालवाचक सम्बन्धवाचक अव्यय) ; — स्थित होता है, अवस्थान करता है (वर्तमान काल) ; — तब (कालवाचक नित्यसम्बन्धी अव्यय) ; — अधिक कहने से क्या? (पदबन्ध) ; — स्वयं, अपने आप (अव्यय) ; — ही, निश्चय ही (निश्चयार्थक अव्यय) ; — स्वयं ही जान लेगा, अनुभूत होगा (भविष्य काल)

जब (वह स्पन्द) मानो देखने की इच्छा से सब अर्थों (विषयों) को व्याप्त करके स्थित होता है, तब अधिक कहने से क्या? — (साधक) स्वयं ही उसे जान लेगा।