Stanzas on the Divine Pulsation · 3.12

Stanzas on the Divine Pulsation 3.12

3.12
प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेज्ज्ञानेनालोक्य गोचरम् । एकत्रारोपयेत्सर्वं ततोऽन्येन न पीड्यते ॥१२॥
prabuddhaḥ sarvadā tiṣṭhej jñānenālokya gocaram | ekatrāropayet sarvaṃ tato 'nyena na pīḍyate ||
anuṣṭubh
— प्रबुद्ध — जागृत साधक (कर्ता कारक) ; — सर्वदा, हर समय (अव्यय) ; — स्थित रहे, बना रहे (विधिलिङ्) ; — ज्ञान से देखकर, अवलोकन करके (पदबन्ध, पूर्वकालिक क्रिया) ; — गोचर — इन्द्रिय-विषय का क्षेत्र (कर्म कारक) ; — एक स्थान (तत्त्व) में आरोपित करे — विधिलिङ् ; — सब कुछ — नपुं.कर्म/कर्ता एक. ; — उससे, तदनन्तर (पञ्चमी-वाचक अव्यय) ; — किसी अन्य (वस्तु) के द्वारा — नपुं.करण एक. ; — पीड़ित नहीं होता, बाधित नहीं होता (कर्मवाच्य, वर्तमान काल)

प्रबुद्ध (जागृत) सदा सावधान रहे, ज्ञान से (इन्द्रिय-)गोचर का अवलोकन करे, और समस्त (जगत) को एक ही (तत्त्व) में आरोपित करे; तब वह अन्य किसी से पीड़ित नहीं होता।