Stanzas on the Divine Pulsation · 1.8

Stanzas on the Divine Pulsation 1.8

1.8
न हीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते । अपि त्वात्मबलस्पर्शात्पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥८॥
na hīcchā-nodanasyāyaṃ prerakatvena vartate | api tv ātma-bala-sparśāt puruṣas tat-samo bhavet ||
anuṣṭubh
— क्योंकि नहीं, निःसंदेह नहीं (अव्यय) ; — इच्छा की प्रेरणा का (षष्ठी एकवचन — समासगत) ; — यह (आत्मा) — पु.कर्ता एक. ; — प्रेरक के रूप में (करण कारक) ; — प्रवृत्त होता है, चलता है (वर्त. तृ.पु.एक., √वृत्) ; — अपितु, बल्कि (विरोध-निरास अव्यय) ; — आत्म-बल के स्पर्श से (अपादान कारक — समासगत) ; — पुरुष, व्यक्ति (कर्ता कारक एकवचन) ; — उसके (स्पन्द-तत्त्व के) समान (कर्ता कारक — समासगत) ; — हो जाए, हो सकता है (विधिलिङ्ग, तृ.पु.एक. √भू)

वह (आत्मा) इच्छा-प्रेरणा का मात्र प्रेरक होकर नहीं प्रवृत्त होता; अपितु आत्म-बल के स्पर्श से पुरुष उस (स्पन्द-तत्त्व) के समान हो जाता है।