Stanzas on the Divine Pulsation 1.7
लभते तत्प्रयत्नेन परीक्ष्यं तत्त्वमादरात् ।
यतः स्वतन्त्रता तस्य सर्वत्रेयमकृत्रिमा ॥७॥
labhate tat-prayatnena parīkṣyaṃ tattvam ādarāt |
yataḥ svatantratā tasya sarvatreyam akṛtrimā ||
anuṣṭubh
— प्राप्त करता है (वर्त. तृ.पु.एक., आत्मनेपद √लभ्) ; — उस (तत्त्व) के लिए (किए गए) प्रयत्न से (करण कारक — समासगत) ; — परीक्ष्य, परीक्षणीय (विधि-कृदन्त, कर्म कारक) ; — तत्त्व, परम वास्तविकता (कर्म कारक) ; — आदर से, श्रद्धापूर्वक — पु.पञ्चमी एक. ; — क्योंकि, जिससे (हेत्वर्थक सम्बन्धवाचक अव्यय) ; — स्वतन्त्रता, परम स्वाधीनता (कर्ता कारक, स्त्रीलिङ्ग) ; — उस (साधक) का — पु.षष्ठी एक. ; — सर्वत्र, सब जगह (अव्यय) ; — यह (स्वतन्त्रता) — स्त्री.कर्ता एक. ; — अकृत्रिम, सहज, अकल्पित (विशेषण, स्त्रीलिङ्ग) उस (तत्त्व) को आदरपूर्वक तथा प्रयत्नपूर्वक खोजकर परीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि उसकी यह अकृत्रिम (सहज) स्वतन्त्रता सर्वत्र विद्यमान है।