न तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् ।
तस्योपलब्धिलोपोऽस्ति तदा ह्यन्योऽनुपलम्भकः ॥१६॥
na tu yo 'ntarmukho bhāvaḥ sarvajñatva-guṇāspadam |
tasyopalabdhi-lopo 'sti tadā hy anyo 'nupalambhakaḥ ||
anuṣṭubh
— किन्तु नहीं (व्याघातार्थक); — जो (तत्त्व, प्रयत्न) — पु.कर्ता एक. सम्बन्धवाचक; — अन्तर्मुख — भीतर की ओर उन्मुख (विशेषण, कर्ता कारक); — भाव — सत्ता, तत्त्व (कर्ता कारक); — सर्वज्ञता आदि गुणों का आश्रय-स्थल (कर्ता कारक — समासगत); — उस (आन्तर तत्त्व) का — पु.षष्ठी एक.; — उपलब्धि का लोप — अनुभूति का अभाव (कर्ता कारक — समासगत); — है, विद्यमान है (वर्त. तृ.पु.एक. √अस्); — तब (कालवाचक नित्यसम्बन्धी अव्यय); — क्योंकि, निश्चय ही (हेत्वर्थक अव्यय); — अन्य (कोई) — पु.कर्ता एक. सर्वनाम; — अनुपलम्भक — अनुभव न करने वाला (कर्ता कारक)
किन्तु जो अन्तर्मुख भाव है — सर्वज्ञत्व आदि गुणों का आश्रय — उसकी उपलब्धि (अनुभूति) का कभी लोप नहीं होता; तब अनुपलम्भक (अनुभव न करने वाला) कोई अन्य ही होता है।