Stanzas on the Divine Pulsation · 1.15

Stanzas on the Divine Pulsation 1.15

1.15
कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते । तस्मिँल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ॥१५॥
kāryonmukhaḥ prayatno yaḥ kevalaṃ so 'tra lupyate | tasmiṃl lupte vilupto 'smīty abudhaḥ pratipadyate ||
anuṣṭubh
— कार्योन्मुख — कार्य की ओर उन्मुख (विशेषण, कर्ता कारक — समासगत) ; — प्रयत्न, यत्न, उद्यम (कर्ता कारक) ; — जो (तत्त्व, प्रयत्न) — पु.कर्ता एक. सम्बन्धवाचक ; — केवल, मात्र (अव्यय) ; — वह (प्रयत्न) — पु.कर्ता एक. ; — यहाँ, इस (में) — अव्यय ; — लुप्त होता है, ओझल हो जाता है (कर्मवाच्य, वर्तमान काल) ; — उस (प्रयत्न) में — पु.अधिकरण एक. ; — लुप्त होने पर (पु.अधि. एक. ppp √लुप्) ; — विलुप्त, नष्ट, उच्छिन्न (भूत कृदन्त, कर्ता कारक) ; — मैं हूँ (वर्त. उत्तम.पु.एक. √अस्) ; — इस प्रकार, ऐसा (उद्धरण-समापक अव्यय) ; — अबुध — अविवेकी, अज्ञानी (कर्ता कारक) ; — ऐसा निष्कर्ष निकालता है (वर्त. तृ.पु.एक., आ.प. √प्रति-पद्)

जो केवल कार्य-उन्मुख प्रयत्न है, वही (सुषुप्ति में) लुप्त होता है; उसके लुप्त हो जाने पर अबुध (अविवेकी) सोचता है — 'मैं नष्ट हो गया'।