— उस (आन्तर तत्त्व) का — पु.षष्ठी एक.; — उपलब्धा — अनुभोक्ता, साक्षी (कर्ता कारक); — निरन्तर, सतत (अव्यय); — तीनों पदों (अवस्थाओं) में अव्यभिचारी (अबाधित) — षष्ठी एकवचन — समासगत; — नित्य, सर्वदा (अव्यय); — हो, हो सकता है (विधिलिङ्ग, तृ.पु.एक. √अस्); — सुप्रबुद्ध — पूर्ण-जागृत साधक के लिए (षष्ठी एकवचन); — उस (अवस्था) के आदि और अन्त में (अधिकरण कारक — समासगत); — अन्य (अल्प-जागृत) के लिए (षष्ठी एकवचन); — किन्तु, परन्तु (विरोधार्थक अव्यय)
तीनों अवस्थाओं में अव्यभिचारी (अबाधित) उस (तत्त्व) का उपलब्धा (अनुभोक्ता) सुप्रबुद्ध (पूर्ण-जागृत) को नित्य उपलब्ध है; अन्य (अल्प-जागृत) को तो वह केवल उस (अवस्था) के आदि-अन्त में ही (दिखता है)।