Stanzas on the Divine Pulsation · 1.17

Stanzas on the Divine Pulsation 1.17

1.17
तस्योपलब्धा सततं त्रिपदाव्यभिचारिणः । नित्यं स्यात्सुप्रबुद्धस्य तदाद्यन्ते परस्य तु ॥१७॥
tasyopalabdhā satataṃ tri-padāvyabhicāriṇaḥ | nityaṃ syāt suprabuddhasya tad-ādy-ante parasya tu ||
anuṣṭubh
— उस (आन्तर तत्त्व) का — पु.षष्ठी एक. ; — उपलब्धा — अनुभोक्ता, साक्षी (कर्ता कारक) ; — निरन्तर, सतत (अव्यय) ; — तीनों पदों (अवस्थाओं) में अव्यभिचारी (अबाधित) — षष्ठी एकवचन — समासगत ; — नित्य, सर्वदा (अव्यय) ; — हो, हो सकता है (विधिलिङ्ग, तृ.पु.एक. √अस्) ; — सुप्रबुद्ध — पूर्ण-जागृत साधक के लिए (षष्ठी एकवचन) ; — उस (अवस्था) के आदि और अन्त में (अधिकरण कारक — समासगत) ; — अन्य (अल्प-जागृत) के लिए (षष्ठी एकवचन) ; — किन्तु, परन्तु (विरोधार्थक अव्यय)

तीनों अवस्थाओं में अव्यभिचारी (अबाधित) उस (तत्त्व) का उपलब्धा (अनुभोक्ता) सुप्रबुद्ध (पूर्ण-जागृत) को नित्य उपलब्ध है; अन्य (अल्प-जागृत) को तो वह केवल उस (अवस्था) के आदि-अन्त में ही (दिखता है)।