तेजःकणप्रसरवदुपलभ्या वियत्यलम् ।
स्थितिः सादाशिवी चासावधिकाराभिमानता ॥२५॥
tejaḥkaṇaprasaravadupalabhyā viyatyalam |
sthitiḥ sādāśivī cāsāvadhikārābhimānatā
तेज:कण (प्रकाश-कण) के प्रसार के समान, (वह शक्ति) वियत् (चित् के व्योम) में भलीभाँति उपलभ्य (अनुभवनीय) है; और यही सादाशिवी स्थिति है — (विश्व-)अधिकार का अभिमान (ग्रहण)।