तस्मादुपायो वक्तव्यो दृष्टकार्यप्रसिद्धये ।
ततः स्वात्मक्रियौन्मुख्यमिच्छाप्रथमकोद्गमः ॥१२॥
tasmādupāyo vaktavyo dṛṣṭakāryaprasiddhaye |
tataḥ svātmakriyaunmukhyamicchāprathamakodgamaḥ
इसलिए दृष्ट (दृश्यमान) कार्यों की प्रसिद्धि (सिद्धि) के लिए उपाय कहा जाना चाहिए; उसमें (सर्वप्रथम) अपने आत्मा की क्रिया के प्रति औन्मुख्य (अभिमुखता) — इच्छा का प्रथम उद्गम (उदय) (होता है)।