The Vision of Śiva· 7.115 / 122

The Vision of Śiva7.115

7.115
स कदाचिल्लोकयात्रामासीनः प्रेक्षते ततः । बहिर्मुखस्य तस्याथ ब्राह्मणी काचिदेव हि ॥११५॥
sa kadācillokayātrāmāsīnaḥ prekṣate tataḥ | bahirmukhasya tasyātha brāhmaṇī kācideva hi
— वह ; — किसी समय ; — लोक-यात्रा (संसार के व्यवहार) को ; — बैठा हुआ ; — देखता है ; — तब ; — बहिर्मुख (बाहर अभिमुख) हुए ; — उस ; — तब ; — ब्राह्मणी ; — कोई एक

वह (पन्द्रहवाँ) किसी समय बैठा हुआ लोक-यात्रा (संसार के व्यवहार) को देखता है; तब उस बहिर्मुख (बाहर की ओर अभिमुख) हुए (पुरुष) को कोई एक ब्राह्मणी (ब्राह्मण-स्त्री दिखाई दी):