यच्छ्राव्यं तच्छिवव्यक्तेस्तच्छिवत्वेन संश्रितः ।
गम्ये ग्राह्ये तथा वाच्ये सुखादावपि सर्वदा ॥१०३॥
yacchrāvyaṃ tacchivavyaktestacchivatvena saṃśritaḥ |
gamye grāhye tathā vācye sukhādāvapi sarvadā
— जो श्राव्य (सुनने योग्य) है, वह (सब) — शिव की अभिव्यक्ति से — शिवत्व के रूप में संश्रित (आश्रित) है; (इसी प्रकार) गम्य (प्राप्य), ग्राह्य (ग्रहणीय) तथा वाच्य (कहने योग्य) में, और सुख आदि में भी, सर्वदा।