The Vision of Śiva· 7.103 / 122

The Vision of Śiva7.103

7.103
यच्छ्राव्यं तच्छिवव्यक्तेस्तच्छिवत्वेन संश्रितः । गम्ये ग्राह्ये तथा वाच्ये सुखादावपि सर्वदा ॥१०३॥
yacchrāvyaṃ tacchivavyaktestacchivatvena saṃśritaḥ | gamye grāhye tathā vācye sukhādāvapi sarvadā
— जो श्राव्य ; — वह शिव की अभिव्यक्ति से ; — वह शिवत्व के रूप में ; — संश्रित (आश्रित) ; — गम्य (प्राप्य) में ; — ग्राह्य (ग्रहणीय) में ; — तथा वाच्य (कहने योग्य) में ; — सुख आदि में भी ; — सर्वदा

— जो श्राव्य (सुनने योग्य) है, वह (सब) — शिव की अभिव्यक्ति से — शिवत्व के रूप में संश्रित (आश्रित) है; (इसी प्रकार) गम्य (प्राप्य), ग्राह्य (ग्रहणीय) तथा वाच्य (कहने योग्य) में, और सुख आदि में भी, सर्वदा।