The Vision of Śiva· 7.104 / 122

The Vision of Śiva7.104

7.104
स्थिते शिवत्वे बद्धास्थो भवेत् सर्वगतः शिवः । मन्तव्ये चाभिमातव्ये बोद्धव्ये धृतिसंगमात् ॥१०४॥
sthite śivatve baddhāstho bhavet sarvagataḥ śivaḥ | mantavye cābhimātavye boddhavye dhṛtisaṃgamāt
— शिवत्व के स्थित होने पर ; — बद्ध आस्था (दृढ़ निश्चय) वाला ; — हो जाएगा ; — सर्वगत शिव ; — मन्तव्य (चिन्तनीय) में ; — और अभिमातव्य (अपना समझने योग्य) में ; — बोद्धव्य (ज्ञेय) में ; — धृति (दृढ़ संकल्प) के संगम से

शिवत्व के स्थित (सिद्ध) हो जाने पर, (उसमें) बद्ध आस्था (दृढ़ निश्चय) वाला (साधक) सर्वगत (सर्वव्यापी) शिव हो जाएगा — मन्तव्य (चिन्तनीय), अभिमातव्य (अपना समझने योग्य) तथा बोद्धव्य (ज्ञेय) में, धृति (दृढ़ संकल्प) के संगम के कारण।