The Vision of Śiva· 7.105 / 122

The Vision of Śiva7.105

7.105
सुखे दुःखे विमोहे च स्थितोऽहं परमः शिवः । प्रतिपादितमेतावत् सर्वमेव शिवात्मकम् ॥१०५॥
sukhe duḥkhe vimohe ca sthito'haṃ paramaḥ śivaḥ | pratipāditametāvat sarvameva śivātmakam
— सुख में, दु:ख में ; — और विमोह में ; — मैं स्थित हूँ ; — परम शिव ; — प्रतिपादित किया गया ; — इतना ही ; — सब कुछ ही ; — शिव-स्वरूप

सुख में, दु:ख में, तथा विमोह (मूढ़ता) में (भी) मैं परम शिव (के रूप में) स्थित हूँ; इतना ही प्रतिपादित किया गया — कि सब कुछ ही शिव-स्वरूप (शिव को आत्मा रखने वाला) है।