The Vision of Śiva· 7.102 / 122

The Vision of Śiva7.102

7.102
यथा तथा प्रतिष्ठामः प्रबुद्धस्येति वर्तनम् । यद्दृश्यं यच्च संस्पृश्यं यद्घ्रेयं रस्यमेव यत् ॥१०२॥
yathā tathā pratiṣṭhāmaḥ prabuddhasyeti vartanam | yaddṛśyaṃ yacca saṃspṛśyaṃ yadghreyaṃ rasyameva yat
— जैसे भी ; — प्रतिष्ठित रहते हैं ; — प्रबुद्ध (जागे हुए) का ; — ऐसा वर्तन (आचरण) ; — जो दृश्य ; — और जो स्पर्शनीय ; — जो घ्रेय (सूँघने योग्य) ; — और जो रस्य (चखने योग्य)

'हम जैसे भी (हों), (फिर भी शिव में) प्रतिष्ठित रहते हैं' — ऐसा प्रबुद्ध (जागे हुए) का वर्तन (आचरण) है। जो कुछ दृश्य है, जो स्पर्शनीय है, जो घ्रेय (सूँघने योग्य) है, और जो रस्य (चखने योग्य) है —