शिव एव फलावस्था व्यापार इति साधुषु ।
भावनाकरणाभ्यां किं शिवस्य सततोदितेः ॥१०१॥
śiva eva phalāvasthā vyāpāra iti sādhuṣu |
bhāvanākaraṇābhyāṃ kiṃ śivasya satatoditeḥ
शिव ही फल-अवस्था है, (और) व्यापार (क्रिया) भी — ऐसा साधुओं (श्रेष्ठ साधकों) में (प्रतिष्ठित है)। सतत-उदित (नित्य प्रकाशमान) शिव के लिए भावना तथा करण से क्या (प्रयोजन)?