दर्शनं यद्यभावस्य तुच्छस्य करणं कथम् ।
बहुभिस्तर्हि तुच्छं हि घटोऽपि जनयेत्कथम् ॥६५॥
darśanaṃ yadyabhāvasya tucchasya karaṇaṃ katham |
bahubhistarhi tucchaṃ hi ghaṭo'pi janayetkatham
यदि (ऐसे) अभाव का — जो तुच्छ (नितान्त असत्) है — दर्शन (हो), तो (उसका) करण (बनाना) कैसे? और यदि तुच्छ (अभाव) बहुत-से (कारणों) से बनाया जा सके, तो घट भी (— जो समान रूप से 'कृत' वस्तु है —) कैसे (कुछ) उत्पन्न करे (तुम्हारे शून्यवादी मत में)?