The Vision of Śiva· 6.65 / 126

The Vision of Śiva6.65

6.65
दर्शनं यद्यभावस्य तुच्छस्य करणं कथम् । बहुभिस्तर्हि तुच्छं हि घटोऽपि जनयेत्कथम् ॥६५॥
darśanaṃ yadyabhāvasya tucchasya karaṇaṃ katham | bahubhistarhi tucchaṃ hi ghaṭo'pi janayetkatham
— दर्शन ; — यदि अभाव का ; — तुच्छ (नितान्त असत्) का ; — करण (बनाना) ; — कैसे ; — बहुत-से (कारणों) से ; — तो ; — तुच्छ ; — निश्चय ही ; — घट भी ; — उत्पन्न करे ; — कैसे

यदि (ऐसे) अभाव का — जो तुच्छ (नितान्त असत्) है — दर्शन (हो), तो (उसका) करण (बनाना) कैसे? और यदि तुच्छ (अभाव) बहुत-से (कारणों) से बनाया जा सके, तो घट भी (— जो समान रूप से 'कृत' वस्तु है —) कैसे (कुछ) उत्पन्न करे (तुम्हारे शून्यवादी मत में)?