The Vision of Śiva· 6.5 / 126

The Vision of Śiva6.5

6.5
तथाविधा विभिन्नास्ते सर्वदा निजभावतः । विभिन्ना एव ते नैक्यं मृत्पिंडात् प्रागवस्थितेः ॥५॥
tathāvidhā vibhinnāste sarvadā nijabhāvataḥ | vibhinnā eva te naikyaṃ mṛtpiṃḍāt prāgavasthiteḥ
— वैसे ; — विभिन्न ; — वे (आत्मा/कार्य) ; — सदा ; — अपने स्वभाव से ; — विभिन्न ही ; — एकता नहीं ; — मृत्पिण्ड से ; — पूर्व-अवस्थान के कारण

(उनके मत में) वैसे (आत्मा या कार्य) सदा अपने ही स्वभाव से विभिन्न हैं; (अतः) वे विभिन्न ही हैं, उनमें कोई एकता नहीं — (जैसे) मृत्पिण्ड में (घट के) पूर्व-अवस्थान के कारण (नहीं, जिसे सत्कार्य-खण्डन पहले ही दूर कर चुका)।