तथाविधा विभिन्नास्ते सर्वदा निजभावतः ।
विभिन्ना एव ते नैक्यं मृत्पिंडात् प्रागवस्थितेः ॥५॥
tathāvidhā vibhinnāste sarvadā nijabhāvataḥ |
vibhinnā eva te naikyaṃ mṛtpiṃḍāt prāgavasthiteḥ
(उनके मत में) वैसे (आत्मा या कार्य) सदा अपने ही स्वभाव से विभिन्न हैं; (अतः) वे विभिन्न ही हैं, उनमें कोई एकता नहीं — (जैसे) मृत्पिण्ड में (घट के) पूर्व-अवस्थान के कारण (नहीं, जिसे सत्कार्य-खण्डन पहले ही दूर कर चुका)।