The Vision of Śiva· 6.4 / 126

The Vision of Śiva6.4

6.4
यत्र ब्रह्मोच्यते चित्रं कैश्चिद्वेदान्तवादिभिः । एकस्य चित्रता केन हेतुना ब्रह्मणो भवेत् ॥४॥
yatra brahmocyate citraṃ kaiścidvedāntavādibhiḥ | ekasya citratā kena hetunā brahmaṇo bhavet
— जहाँ ; — ब्रह्म ; — कहा जाता है ; — चित्र (विचित्र) ; — कुछ वेदान्तवादियों द्वारा ; — एक की ; — विचित्रता ; — किस हेतु से ; — ब्रह्म की ; — हो

जहाँ कुछ वेदान्तवादियों द्वारा ब्रह्म चित्र (विचित्र) कहा जाता है — (वहाँ) एक ब्रह्म की विचित्रता किस हेतु से हो (जिसे वे निरंश और एकरस मानते हैं)?