भेदवानिति लक्ष्यत्वे दृष्टान्तोऽस्ति न तादृशः ।
ग्राह्यग्राहकसंवित्तेर्भेदवानिव लक्ष्यते ॥३९॥
bhedavāniti lakṣyatve dṛṣṭānto'sti na tādṛśaḥ |
grāhyagrāhakasaṃvitterbhedavāniva lakṣyate
यदि (ज्ञान) 'भेदवान्' (भेद-सहित) के रूप में लक्षित हो, तो वैसा (कोई) दृष्टान्त (नहीं मिलता); (अपितु) ग्राह्य-ग्राहक की एक संवित् ही मानो भेदवान् लक्षित होती है (जबकि वस्तुतः अभिन्न है)।