The Vision of Śiva· 6.38 / 126

The Vision of Śiva6.38

6.38
विभागकालग्रहणकालयोर्भिन्नकालता । विनष्टत्वात् फलं कस्य क्रमात्कर्मफले यतः ॥३८॥
vibhāgakālagrahaṇakālayorbhinnakālatā | vinaṣṭatvāt phalaṃ kasya kramātkarmaphale yataḥ
— विभाग-काल और ग्रहण-काल की ; — भिन्न-कालता ; — (पूर्व-क्षण के) विनष्ट होने से ; — फल ; — किसका ; — क्रम से ; — कर्म-फल में ; — क्योंकि

विभाग-काल (विभेद के क्षण) और ग्रहण-काल — इन दोनों में भिन्न-कालता (होगी); और (पूर्व-क्षण के) विनष्ट हो जाने से फल किसका? — क्योंकि कर्म और फल में क्रम (है, पर उसे ग्रहण करने वाला कोई स्थायी प्रमाता क्षणिकवादी के पास नहीं)।