The Vision of Śiva· 6.18 / 126

The Vision of Śiva6.18

6.18
ताभ्यां नचास्योपरागः प्रबुद्धत्वात्प्रभुत्वतः । तथान्येषां स्वात्मनैव विद्यया जगदात्मता ॥१८॥
tābhyāṃ nacāsyoparāgaḥ prabuddhatvātprabhutvataḥ | tathānyeṣāṃ svātmanaiva vidyayā jagadātmatā
— उन दोनों से ; — नहीं ; — उसका ; — उपराग (मलिनता) ; — प्रबुद्ध होने के कारण ; — प्रभु होने के कारण ; — और अन्यों के (मत में) ; — अपने ही आत्मा से ; — विद्या से ; — जगत्-आत्मत्व

और उन दोनों से उसका उपराग (मलिनता) नहीं होता, (उसके) प्रबुद्ध और प्रभु होने के कारण; और (कुछ) अन्यों के (मत में) अपने ही आत्मा से, विद्या के द्वारा, उसका जगत्-आत्मत्व (होता है)।