ताभ्यां नचास्योपरागः प्रबुद्धत्वात्प्रभुत्वतः ।
तथान्येषां स्वात्मनैव विद्यया जगदात्मता ॥१८॥
tābhyāṃ nacāsyoparāgaḥ prabuddhatvātprabhutvataḥ |
tathānyeṣāṃ svātmanaiva vidyayā jagadātmatā
और उन दोनों से उसका उपराग (मलिनता) नहीं होता, (उसके) प्रबुद्ध और प्रभु होने के कारण; और (कुछ) अन्यों के (मत में) अपने ही आत्मा से, विद्या के द्वारा, उसका जगत्-आत्मत्व (होता है)।