The Vision of Śiva· 6.17 / 126

The Vision of Śiva6.17

6.17
विद्याविद्ये द्वयं चास्य साधनं समवस्थितम् । अविद्यया जगत्कुर्याद्विद्यया मोक्षयेत्पशून् ॥१७॥
vidyāvidye dvayaṃ cāsya sādhanaṃ samavasthitam | avidyayā jagatkuryādvidyayā mokṣayetpaśūn
— विद्या और अविद्या ; — दोनों ; — और उसके ; — साधन ; — स्थित ; — अविद्या से ; — जगत् ; — रचता है ; — विद्या से ; — मुक्त करता है ; — पशुओं को

और विद्या-अविद्या — ये दोनों उसके साधन रूप में स्थित हैं: अविद्या से वह जगत् रचता है, विद्या से पशुओं (बद्ध जीवों) को मुक्त करता है।