निजं तस्य न हीयेत तद्वत् परमकारणे ।
यदि तत्तर्हि मोक्षेऽपि विशेषः किं निवार्यते ॥११३॥
nijaṃ tasya na hīyeta tadvat paramakāraṇe |
yadi tattarhi mokṣe'pi viśeṣaḥ kiṃ nivāryate
उस (राजा) का निज (स्वकीय राजस्वरूप राज्य करने से) हीन नहीं होता; उसी प्रकार परमकारण (शिव) में (भी)। यदि वह (स्वीकृत हो) — तो मोक्ष में भी (शिव और मुक्त के बीच) विशेष (भेद) क्यों निवारित किया जाता है (— एकशिव-मत में वह विलीन हो जाता है)?