The Vision of Śiva· 5.91 / 110

The Vision of Śiva5.91

5.91
मायीयत्वे जगति वा प्राकृते वान्यथापिवा । अमूर्तकारणैर्योगात्तन्मूर्तत्वं निवार्यते ॥९१॥
māyīyatve jagati vā prākṛte vānyathāpivā | amūrtakāraṇairyogāttanmūrtatvaṃ nivāryate
— जगत् के मायीय होने पर ; — जगत् ; — अथवा ; — प्राकृत (प्रकृति-जन्य) ; — अथवा ; — अन्यथा भी ; — अमूर्त कारणों के साथ ; — योग के कारण ; — उसका ; — मूर्तत्व ; — निवारित होता है

चाहे जगत् मायीय (माया-जन्य) हो, अथवा प्राकृत (प्रकृति-जन्य), अथवा अन्यथा भी — अमूर्त कारणों के साथ योग के कारण उसका (वास्तविक) मूर्तत्व निवारित होता है (— सब अमूर्त चित् से ही व्युत्पन्न है)।