मायीयत्वे जगति वा प्राकृते वान्यथापिवा ।
अमूर्तकारणैर्योगात्तन्मूर्तत्वं निवार्यते ॥९१॥
māyīyatve jagati vā prākṛte vānyathāpivā |
amūrtakāraṇairyogāttanmūrtatvaṃ nivāryate
चाहे जगत् मायीय (माया-जन्य) हो, अथवा प्राकृत (प्रकृति-जन्य), अथवा अन्यथा भी — अमूर्त कारणों के साथ योग के कारण उसका (वास्तविक) मूर्तत्व निवारित होता है (— सब अमूर्त चित् से ही व्युत्पन्न है)।