कथमाकारघटना व्योम्नि नित्येव नीलता ।
आत्मेच्छातः स्थिता भावाः स्थितैवासावमूर्तता ॥९०॥
kathamākāraghaṭanā vyomni nityeva nīlatā |
ātmecchātaḥ sthitā bhāvāḥ sthitaivāsāvamūrtatā
अन्यथा आकारों की घटना (वस्तुओं के आकार बनना) कैसे (हो), अथवा आकाश में मानो नित्य नीलता (कैसे प्रतीत हो)? भाव आत्मा की इच्छा से स्थित हैं; (अतः) यह अमूर्तता स्थित ही है।