The Vision of Śiva· 5.73 / 110

The Vision of Śiva5.73

5.73
प्रत्यक्षत्वं प्रसज्येत तथाप्तत्वेऽप्यनिश्चयात् । स्वातन्त्र्यं नच शब्दस्य रचनात्वेन युज्यते ॥७३॥
pratyakṣatvaṃ prasajyeta tathāptatve'pyaniścayāt | svātantryaṃ naca śabdasya racanātvena yujyate
— प्रत्यक्षत्व ; — प्रसंग आ जाएगा ; — इसी प्रकार ; — आप्तता में भी ; — अनिश्चय के कारण ; — स्वातन्त्र्य ; — और नहीं ; — शब्द का ; — रचना होने के नाते ; — उचित

(विशेष से तो) प्रत्यक्षत्व का प्रसंग (आ जाएगा); और इसी प्रकार, (वक्ता की) आप्तता (विश्वसनीयता) में भी अनिश्चय होने के कारण, शब्द का स्वातन्त्र्य (स्वतन्त्र प्रामाण्य) उसके (मानवीय) रचना होने के नाते उचित नहीं।