The Vision of Śiva· 5.17 / 110

The Vision of Śiva5.17

5.17
स्वकर्मणि ममैतत्तदित्यज्ञानान्न चेष्टनम् । कूलं पिपतिषति गोर्व्यवहारः प्रसिद्ध्यति ॥१७॥
svakarmaṇi mamaitattadityajñānānna ceṣṭanam | kūlaṃ pipatiṣati gorvyavahāraḥ prasiddhyati
— अपने कर्म में ; — 'यह, वह मेरा (करणीय)' ; — इस प्रकार ; — ज्ञान के बिना ; — नहीं ; — चेष्टा ; — किनारा ; — 'गिरने को है' ; — गाय (विषयक) ; — व्यवहार ; — प्रसिद्ध है

अपने कर्म में 'यह, वह मेरा (करणीय) है' — इस (प्रकार के) ज्ञान के बिना चेष्टा नहीं (होती); (यद्यपि गौण प्रयोग प्रसिद्ध हैं —) 'किनारा गिरने को है' अथवा गाय (विषयक) व्यवहार प्रसिद्ध है (अतः विरोधी इन्हें गौण कहे; हम उत्तर देते हैं कि ये गौण नहीं)।