स्वकर्मणि ममैतत्तदित्यज्ञानान्न चेष्टनम् ।
कूलं पिपतिषति गोर्व्यवहारः प्रसिद्ध्यति ॥१७॥
svakarmaṇi mamaitattadityajñānānna ceṣṭanam |
kūlaṃ pipatiṣati gorvyavahāraḥ prasiddhyati
अपने कर्म में 'यह, वह मेरा (करणीय) है' — इस (प्रकार के) ज्ञान के बिना चेष्टा नहीं (होती); (यद्यपि गौण प्रयोग प्रसिद्ध हैं —) 'किनारा गिरने को है' अथवा गाय (विषयक) व्यवहार प्रसिद्ध है (अतः विरोधी इन्हें गौण कहे; हम उत्तर देते हैं कि ये गौण नहीं)।