अपूर्वयोर्गृहीतेऽपि तत्कालं गतयोर्द्वयोः ।
अगृहीते न गृहीतः सम्बन्धोऽग्निः प्रतीयते ॥८४॥
apūrvayorgṛhīte'pi tatkālaṃ gatayordvayoḥ |
agṛhīte na gṛhītaḥ sambandho'gniḥ pratīyate
पहले कभी (साथ) न दिए गए उन दोनों (क्षणिक धूम-अग्नि) के, अपने-अपने काल में, गृहीत होने पर भी, दोनों बीत चुके; (अतः) सम्बन्ध के अगृहीत रहते, अगृहीत सम्बन्ध से (ही) अग्नि का अनुमान किया जाता है (— जो क्षणिकवादी के मत में असम्भव है)।