The Vision of Śiva· 4.83 / 124

The Vision of Śiva4.83

4.83
तेन ज्ञेयमेकमेव वस्तु भिन्ने ग्रहः कुतः । तथानुमानं न भवेद्धूमाग्न्योरन्वये क्वचित् ॥८३॥
tena jñeyamekameva vastu bhinne grahaḥ kutaḥ | tathānumānaṃ na bhaveddhūmāgnyoranvaye kvacit
— इसलिए ; — ज्ञातव्य ; — एक ही ; — वस्तु ; — भिन्न (पृथक्) में ; — ग्रह (ग्रहण) ; — कहाँ से ; — इसी प्रकार ; — अनुमान ; — नहीं हो सके ; — धूम-अग्नि का ; — अन्वय (व्याप्ति) में ; — कहीं

इसलिए ज्ञेय (वस्तु) एक ही जानने योग्य है; भिन्न (पृथक् वस्तु) में ग्रह (ग्रहण) कहाँ से? इसी प्रकार धूम और अग्नि के अन्वय (व्याप्ति) में (वास्तविक आधार न होने पर) अनुमान कहीं नहीं हो सकेगा।