तेन ज्ञेयमेकमेव वस्तु भिन्ने ग्रहः कुतः ।
तथानुमानं न भवेद्धूमाग्न्योरन्वये क्वचित् ॥८३॥
tena jñeyamekameva vastu bhinne grahaḥ kutaḥ |
tathānumānaṃ na bhaveddhūmāgnyoranvaye kvacit
इसलिए ज्ञेय (वस्तु) एक ही जानने योग्य है; भिन्न (पृथक् वस्तु) में ग्रह (ग्रहण) कहाँ से? इसी प्रकार धूम और अग्नि के अन्वय (व्याप्ति) में (वास्तविक आधार न होने पर) अनुमान कहीं नहीं हो सकेगा।