विरुद्धरूपयोर्भिन्नकरणग्राह्ययोरपि ।
मुखे हि शब्दो भूमौ च विद्यतेऽर्थः क्व संगमः ॥७१॥
viruddharūpayorbhinnakaraṇagrāhyayorapi |
mukhe hi śabdo bhūmau ca vidyate'rthaḥ kva saṃgamaḥ
और विरुद्ध-रूप तथा भिन्न-भिन्न करणों से ग्राह्य (दो) वस्तुओं का — क्योंकि शब्द तो मुख में (उत्पन्न होता) है, और अर्थ भूमि पर विद्यमान है — (उनका) संगम (मेल) कहाँ (चित् के बिना)?