The Vision of Śiva· 4.71 / 124

The Vision of Śiva4.71

4.71
विरुद्धरूपयोर्भिन्नकरणग्राह्ययोरपि । मुखे हि शब्दो भूमौ च विद्यतेऽर्थः क्व संगमः ॥७१॥
viruddharūpayorbhinnakaraṇagrāhyayorapi | mukhe hi śabdo bhūmau ca vidyate'rthaḥ kva saṃgamaḥ
— विरुद्ध-रूप (दो) का ; — भिन्न-भिन्न करणों से ग्राह्य का ; — भी ; — मुख में ; — क्योंकि ; — शब्द ; — भूमि पर ; — और ; — विद्यमान है ; — अर्थ ; — कहाँ संगम

और विरुद्ध-रूप तथा भिन्न-भिन्न करणों से ग्राह्य (दो) वस्तुओं का — क्योंकि शब्द तो मुख में (उत्पन्न होता) है, और अर्थ भूमि पर विद्यमान है — (उनका) संगम (मेल) कहाँ (चित् के बिना)?