सुवर्णमानयेत्युक्ते शून्यता किं प्रतीयते ।
विशेषस्पर्शविरहात्कदाचिदपि युज्यते ॥६९॥
suvarṇamānayetyukte śūnyatā kiṃ pratīyate |
viśeṣasparśavirahātkadācidapi yujyate
'सुवर्ण लाओ' — ऐसा कहने पर क्या शून्यता प्रतीत होती है? (अपोह-वादी के मत में) विशेष के स्पर्श के अभाव से क्या यह (व्यवहार) कभी सम्भव होगा?