The Vision of Śiva· 4.69 / 124

The Vision of Śiva4.69

4.69
सुवर्णमानयेत्युक्ते शून्यता किं प्रतीयते । विशेषस्पर्शविरहात्कदाचिदपि युज्यते ॥६९॥
suvarṇamānayetyukte śūnyatā kiṃ pratīyate | viśeṣasparśavirahātkadācidapi yujyate
— 'सुवर्ण लाओ' ; — ऐसा कहने पर ; — शून्यता ; — क्या प्रतीत होती है ; — विशेष के स्पर्श के अभाव से ; — कभी भी ; — सम्भव होगा

'सुवर्ण लाओ' — ऐसा कहने पर क्या शून्यता प्रतीत होती है? (अपोह-वादी के मत में) विशेष के स्पर्श के अभाव से क्या यह (व्यवहार) कभी सम्भव होगा?