सामान्यरूपता वास्ति सा चाभिन्ना विशेषतः ।
भिन्नाभिन्नात्मकः क्वापि पदार्थस्तादृगिष्यते ॥६७॥
sāmānyarūpatā vāsti sā cābhinnā viśeṣataḥ |
bhinnābhinnātmakaḥ kvāpi padārthastādṛgiṣyate
अथवा (यथार्थवादी कहता है कि) सामान्य-रूपता है, और वह विशेष से अभिन्न है; (अतः) कहीं भी पदार्थ वैसा ही — भिन्न-अभिन्न-स्वरूप — माना जाता है।