तद्वन्न किं पृथिव्यादेर्बौद्धे ज्ञानमवस्थितम् ।
स्वान्यप्रकाशकं नान्यत्तद्वदन्यन्न किं भवेत् ॥३९॥
tadvanna kiṃ pṛthivyāderbauddhe jñānamavasthitam |
svānyaprakāśakaṃ nānyattadvadanyanna kiṃ bhavet
उसी प्रकार, क्या पृथ्वी आदि का ज्ञान बौद्ध-(मत में) (केवल) विज्ञान में अवस्थित नहीं — जो स्व और अन्य का प्रकाशक है, और कुछ नहीं? उसी (तर्क) से क्या अन्य (उनका मत हमारे ही मत में परिणत) नहीं हो जाएगा?