The Vision of Śiva· 4.39 / 124

The Vision of Śiva4.39

4.39
तद्वन्न किं पृथिव्यादेर्बौद्धे ज्ञानमवस्थितम् । स्वान्यप्रकाशकं नान्यत्तद्वदन्यन्न किं भवेत् ॥३९॥
tadvanna kiṃ pṛthivyāderbauddhe jñānamavasthitam | svānyaprakāśakaṃ nānyattadvadanyanna kiṃ bhavet
— उसी प्रकार ; — क्या नहीं ; — पृथ्वी आदि का ; — बौद्ध (मत) में ; — ज्ञान ; — अवस्थित ; — स्व-अन्य का प्रकाशक ; — और कुछ नहीं ; — उसी प्रकार ; — क्या अन्य (मत हमारे में परिणत) न हो जाए

उसी प्रकार, क्या पृथ्वी आदि का ज्ञान बौद्ध-(मत में) (केवल) विज्ञान में अवस्थित नहीं — जो स्व और अन्य का प्रकाशक है, और कुछ नहीं? उसी (तर्क) से क्या अन्य (उनका मत हमारे ही मत में परिणत) नहीं हो जाएगा?