The Vision of Śiva· 4.20 / 124

The Vision of Śiva4.20

4.20
कूटकार्षापणादौ वा व्यवहारोऽपि दृश्यते । तावता व्यवहारो वा यदात्माह्लादमात्रकम् ॥२०॥
kūṭakārṣāpaṇādau vā vyavahāro'pi dṛśyate | tāvatā vyavahāro vā yadātmāhlādamātrakam
— कूट (नकली) कार्षापण आदि में ; — अथवा ; — व्यवहार भी ; — दीखता है ; — उतने से ; — व्यवहार ; — अथवा ; — जो ; — आत्म-आह्लाद-मात्र

और कूट (नकली) कार्षापण आदि में भी व्यवहार दीखता है; तो (इससे सिद्ध हुआ कि) व्यवहार (सत्यता का प्रमाण नहीं) — (असली कसौटी तो) जो आत्म-आह्लाद-मात्र है (वही है)।