परस्परेण चाप्यत्र तेषां रूपेण वान्यथा ।
तस्मात् समस्तभावानामैक्येनैवास्ति संगमः ॥१२३॥
paraspareṇa cāpyatra teṣāṃ rūpeṇa vānyathā |
tasmāt samastabhāvānāmaikyenaivāsti saṃgamaḥ
और यहाँ भी, चाहे वे (वस्तुएँ) परस्पर अपने रूप से (जुड़ें), अथवा अन्यथा — इसलिए समस्त भावों का संगम एकता से ही होता है।