The Vision of Śiva· 4.122 / 124

The Vision of Śiva4.122

4.122
तस्मादैक्यमिह स्पष्टं संसारे समवस्थितम् । एषैव वार्ता संयोगे वस्तुरूपतया स्थिते ॥१२२॥
tasmādaikyamiha spaṣṭaṃ saṃsāre samavasthitam | eṣaiva vārtā saṃyoge vasturūpatayā sthite
— इसलिए ; — एकता ; — यहाँ ; — स्पष्ट ; — संसार में ; — अवस्थित ; — यही बात ; — संयोग के विषय में ; — वस्तु-रूप से ; — स्थित (मान लिए जाने) पर

इसलिए यहाँ संसार में एकता स्पष्ट रूप से अवस्थित है; और यही बात संयोग के विषय में (भी लागू है), जब वह (संयोग) वस्तु-रूप से स्थित (मान लिया) जाए (— वह भी अन्तर्निहित एकता की अपेक्षा रखता है)।