The Vision of Śiva· 4.1 / 124

The Vision of Śiva4.1

4.1
अथेदानीं प्रवक्तव्यं यथा सर्वं शिवात्मकम् । नाशक्तो विद्यते कश्चिच्छक्तं वस्त्वेव तेऽपि नो ॥१॥
athedānīṃ pravaktavyaṃ yathā sarvaṃ śivātmakam | nāśakto vidyate kaścicchaktaṃ vastveva te'pi no
— अब इस समय ; — कहना है ; — किस प्रकार ; — सब कुछ ; — शिवात्मक ; — नहीं ; — अशक्त (वस्तु) ; — विद्यमान है ; — कोई ; — शक्त (समर्थ) ; — ही वस्तु (सत्) ; — वे भी ; — अशक्त नहीं

अब इस समय यह कहना है कि किस प्रकार सब कुछ शिवात्मक है। कोई भी अशक्त (वस्तु) विद्यमान नहीं; शक्त (समर्थ) ही वस्तु (सत्) है — और वे (भाव) भी अशक्त नहीं।