निमित्तसमवाययादिवैचित्र्यं तद्विचित्रता ।
कारणस्यैकरूपत्वे न दोषस्त्रितयात्मता ॥८०॥
nimittasamavāyayādivaicitryaṃ tadvicitratā |
kāraṇasyaikarūpatve na doṣastritayātmatā
निमित्त, समवायी आदि (कारणों) का वैचित्र्य उसी (शिव) की विचित्रता है; कारण के एक-रूप होने पर कोई दोष नहीं, (क्योंकि वह एक कारण ही) त्रितय-स्वरूप (इच्छा-ज्ञान-क्रिया) है।